पिछले दिनों दिल्ली में एक बड़े संगठन के अखिल भारतीय अधिकारी ने चर्चा के दौरान बताया कि भारतीय पौराणिक इतिहास में दैत्यों ने विभिन्न वरदान प्राप्त करके खुद को बिल्कुल अपराजेय सा बना लिया था । जैसे रक्तबीज के रक्त की एक बूंद पृथ्वी पर गिरते ही असंख्य रक्तबीज पैदा हो जाते थे, हिरण्यकश्यप को ना कोई दिन में मार सकता था ना रात में, ना आकाश में ना पाताल में, ना घर के अंदर ना बाहर इत्यादि, दशानन रावण की नाभि में अमृतकुंड था जिसके खत्म होने के बाद ही उसकी मृत्यु संभव थी । इसी प्रकार अन्य दैत्य जैसे मधु कैटभ, भस्मासुर, शुम्भ निशुम्भ आदि को भी ऐसे ही कुछ वरदान प्राप्त हुए । किंतु भगवान ने भिन्न भिन्न रूप लेकर उनके वरदान की गरिमा का ध्यान रखते हुए उसी के बीच से कोई ना कोई रास्ता निकाला और उन सभी का वध किया । आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो एक समाज के तौर पर हम भी अनगिनत दैत्यों का सामना हर रोज कर रहे हैं जैसे भ्रष्टाचार, जातिवाद का ज़हर, व्यभिचार, आर्थिक शोषण, आतंकवाद, जमाखोरी, टैक्स चोरी आदि आदि । ऐसा प्रतीत होता है कि इनका कोई हल नहीं हो सकता किंतु कभी तो कोई ना कोई मार्ग अवश्य मिलेगा इनसे मुक्ति का । शायद तब हम कह सकेंगे कि अब स्वाधीनता के साथ स्वतंत्रता भी प्राप्त हो गयी है । प्रयास कीजिये उस मार्ग को ढूंढने का।
सभी को 79वें स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं ।।
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